Tuesday, 25 February 2020

कविता ; जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में

कविता ; जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में 

----प्रभुदयाल खट्टर 

इस प्रचंड  कोलाहल में 
तुम्हारे द्वारा 
स्वरों को संज्ञायित ना कर पाना, 
स्वरों की अपंगता नहीं 
अपितु स्वरों के प्रति 
तुम्हारी ग्रहणशीलता का अभाव है ,
जो कि तुम्हें 
बुनने देता है एकपक्षीय निर्णय 
और तुम निर्णायक का लबादा ओढ़कर  
स्वयं ही अपने 
सूर्य होने की घोषणा करके 
धरती को अपने चारों ओर 
घूमने को बाध्य करते हो ,
यह तुम्हारी सीधी और स्पष्ट 
तानाशाही है 
जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में 
दोस्तों की नहीं 
दासों की वृद्धि  की सूचक बनेगी।  

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कविता ; जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में  ----प्रभुदयाल खट्टर  इस प्रचंड  कोलाहल में  तुम्हारे द्वारा  स्वरों को संज्ञायित ना कर पाना,  ...