कविता ; जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में
----प्रभुदयाल खट्टर
इस प्रचंड कोलाहल में
तुम्हारे द्वारा
स्वरों को संज्ञायित ना कर पाना,
स्वरों की अपंगता नहीं
अपितु स्वरों के प्रति
तुम्हारी ग्रहणशीलता का अभाव है ,
जो कि तुम्हें
बुनने देता है एकपक्षीय निर्णय
और तुम निर्णायक का लबादा ओढ़कर
स्वयं ही अपने
सूर्य होने की घोषणा करके
धरती को अपने चारों ओर
घूमने को बाध्य करते हो ,
यह तुम्हारी सीधी और स्पष्ट
तानाशाही है
जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में
दोस्तों की नहीं
दासों की वृद्धि की सूचक बनेगी।
----प्रभुदयाल खट्टर
इस प्रचंड कोलाहल में
तुम्हारे द्वारा
स्वरों को संज्ञायित ना कर पाना,
स्वरों की अपंगता नहीं
अपितु स्वरों के प्रति
तुम्हारी ग्रहणशीलता का अभाव है ,
जो कि तुम्हें
बुनने देता है एकपक्षीय निर्णय
और तुम निर्णायक का लबादा ओढ़कर
स्वयं ही अपने
सूर्य होने की घोषणा करके
धरती को अपने चारों ओर
घूमने को बाध्य करते हो ,
यह तुम्हारी सीधी और स्पष्ट
तानाशाही है
जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में
दोस्तों की नहीं
दासों की वृद्धि की सूचक बनेगी।
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