कविता ;दिनमानों का निर्माण
---- प्रभुदयाल खट्टर
अनुभूतिओं के खौलते ज्वालामुखी जैसे
प्रकाशपुंजों से शाश्वत सत्य के -
दिनमानों का निर्माण अब दूर नहीं।
यहां सब उन्मुक्त मेघों की तरह
आस के इंद्रधनुष बुन सकेंगें --
जो निष्कपट सरल मुस्कानों में -
अपने तम का सवेरा चुन सकेंगें ,
जो अपने अटूट बाहुबल से
पुरुषार्थ की ऐसी इमारत गढ़ेंगे
जिसमें भविष्य के अतिथि -
शौर्य के नवीन अध्याय पढ़ेंगे ,
जो घृणा से भरी रक्त नाड़ियों के विष को
स्नेह के अमृत से सींचेंगे
जो मस्तिष्क के निर्णयों के जलयान में भरा
समस्त कुंठित जल लगातार उलीचेंगे ,
जो सदियों से रूढ़ियों में जकड़े
घुटन से भरे सभी आलेखों को धो डालेगा
उस तूफ़ान का प्रमाण अब दूर नहीं।
अनुभूतिओं के खौलते ज्वालामुखी जैसे
प्रकाशपुंजों से शाश्वत सत्य के -
दिनमानों का निर्माण अब दूर नहीं।

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