Tuesday, 25 February 2020

कविता ; जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में

कविता ; जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में 

----प्रभुदयाल खट्टर 

इस प्रचंड  कोलाहल में 
तुम्हारे द्वारा 
स्वरों को संज्ञायित ना कर पाना, 
स्वरों की अपंगता नहीं 
अपितु स्वरों के प्रति 
तुम्हारी ग्रहणशीलता का अभाव है ,
जो कि तुम्हें 
बुनने देता है एकपक्षीय निर्णय 
और तुम निर्णायक का लबादा ओढ़कर  
स्वयं ही अपने 
सूर्य होने की घोषणा करके 
धरती को अपने चारों ओर 
घूमने को बाध्य करते हो ,
यह तुम्हारी सीधी और स्पष्ट 
तानाशाही है 
जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में 
दोस्तों की नहीं 
दासों की वृद्धि  की सूचक बनेगी।  

Friday, 21 February 2020

अर्जित ज्ञान

 अर्जित ज्ञान
 ------प्रभु दयाल खट्टर    

कोयला मात्र एक गौण पत्थर है 
अपनी हथेली पर रखो 
होगा प्रतीत वह -
दीन है ,प्रभावहीन है , 



लेकिन कब तक ?
जब तक अग्निविहीन है.
जब वह आग्नेय हो जाये 
तब यदि कोई उसे बनाये 
निज हथेली का भाग 
तब ही ज्ञात होगा कि 
वह मात्र गौण पत्थर नहीं
वह तो है --
शुद् सौ प्रतिशत आग, 
अभिप्रेत है स्पष्ट यहां 
जो गौण है ,जो दीन है 
परिस्तिथि विशेष में 
वह आपके अर्जित ज्ञान को 
निरुत्तर करने में प्रवीण है। 

Thursday, 20 February 2020

लापता मशाल का जिक्र

लापता मशाल का जिक्र 

---- प्रभुदयाल खट्टर

कालचक्र के दुरुह पथ पर 
मील के पत्थरों  की  जगह --
अब गाड़े जा रहे काल पात्र ,
और अलोकपुंजों  के 
वितरण  की पीढ़ीगत व्यवस्था 
अब जारी नहीं रही ,
भविष्य पुत्र जब मार्गदर्शक 
मशालों की ओर ताकेंगे ,
तब उनके अधिकार पत्रों में 
चिपकाये जायेंगे ---
इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ  ,
संभवत: इस से --
प्रकाश स्तम्भों का गौरव  झलके,
किन्तु तत्कालीन पीढ़ियों  से --
छिप नहीं सकेगा -
कि उनके आस पास से 
प्रकाश गुम  है ,
मशाल  गुम है जो कि 
स्वतंत्रता के बाद निरंतर 
प्रज्ज्वलित रखने के लिए 
उत्तराधिकारियों  को सौंपी गयी थी।

Wednesday, 19 February 2020

कविता ;दिनमानों का निर्माण


कविता ;दिनमानों  का निर्माण 




---- प्रभुदयाल खट्टर

अनुभूतिओं के खौलते ज्वालामुखी जैसे 
प्रकाशपुंजों  से शाश्वत सत्य के -
दिनमानों का निर्माण अब दूर नहीं। 

यहां सब उन्मुक्त मेघों की तरह
आस के इंद्रधनुष बुन सकेंगें --
जो निष्कपट सरल मुस्कानों में -
अपने तम का सवेरा चुन सकेंगें ,
जो अपने अटूट बाहुबल से 
पुरुषार्थ की ऐसी इमारत गढ़ेंगे 
जिसमें भविष्य के अतिथि -
शौर्य के नवीन अध्याय पढ़ेंगे ,
जो घृणा से भरी रक्त नाड़ियों के विष को 
स्नेह के अमृत से सींचेंगे 
जो मस्तिष्क के निर्णयों के जलयान में भरा 
समस्त कुंठित जल लगातार उलीचेंगे ,
जो सदियों से रूढ़ियों में जकड़े 
घुटन से भरे सभी आलेखों को धो डालेगा 
उस तूफ़ान का प्रमाण अब दूर नहीं।  

अनुभूतिओं के खौलते ज्वालामुखी जैसे 
प्रकाशपुंजों  से शाश्वत सत्य के -
दिनमानों  का निर्माण अब दूर नहीं। 

कविता ; जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में

कविता ; जोकि तुम्हारी उपलब्धियों में  ----प्रभुदयाल खट्टर  इस प्रचंड  कोलाहल में  तुम्हारे द्वारा  स्वरों को संज्ञायित ना कर पाना,  ...